‘मेरा मिशन’
‘ विश्व मिशन मानवता ’
विश्व आधार , परमसत्य , परमपिता परमात्मा के संकल्प से ही मानव अस्तित्व में आया है । सम्पूर्ण मानव जाति उसके इसी संकल्प का परिणाम है । सभी मानव उसी एक परमपिता परमात्मा की संकलिप्त संतान हैं । यही सच्चाई सबके मन , सबकी सोच में समाहित होनी चाहिए । क्योंकि यही जगत का सत्य और यही जगत का यथार्थ है ।
उसी परमपिता ,परम ईश्वर ने अपनी सृष्टि के माध्यम से जगत को अनंत ऐश्वर्य , अनंत संपदा प्रदान की है । जिसमें सभी कुछ है । मानव को केवल अपने कर्म द्वारा उसे अपने उपयोग के योग्य बनाना है । यही जगत का कर्मयोग है । इस सुअवसर को परमात्मा ही प्रदान करता है । और इस योग के द्वारा वह मनुष्यों को अपने साथ जोड़ लेता है ।
यदि हम इस सत्यभाव को सदैव साथ लेकर चलेंगे कि हम सब उसी एक सत्यात्मा उसी परमात्मा की संतान हैं तो यह सत्यभाव अर्थात सद्भाव सबको सदैव एक सूत्र में बांध कर रखेगा । क्योंकि यह भाव सत्य अर्थात परमात्मा की अनुभूति युक्त है । फिर कहीं किसी मतभेद की सम्भावना ही नहीं बचेगी ।
यह मतभेद केवल अज्ञान अर्थात यथार्थ ज्ञान से अनिभिज्ञता के कारण ही सूझता है । यथार्थ अर्थात सच्चाई को जान लेने के पश्चात यह भ्रम स्वतः निर्मूल सिद्ध हो जाता है ।
जगत में उपलब्ध सम्पूर्ण ऐश्वर्य एवं सम्पूर्ण सम्पदा परमपिता परमात्मा ने मानव के उपयोग के लिए ही प्रदान की है । जब तक मनुष्य जीवित रहे तब तक इसका उपयोग करे । किन्तु कभी भी इससे जुड़े नहीं , अर्थात इसे अपना न समझ बैठे । क्योंकि यह सम्पूर्ण ऐश्वर्य तो परमात्मा का है ,वही इसका स्वामी है । किसी अन्य में इसका स्वामी होने की न तो क्षमता है और न ही सामर्थ्य है । क्योंकि प्रत्येक मनुष्य जगत से खाली हाथ ही जाता है ।
इस जगत के समस्त मूलतत्त्व , मूलपदार्थ परमात्मा में निहित हैं । उनको उत्पन्न या निर्मित करने की सामर्थ्य परमात्मा के अतिरिक्त अन्य किसी में नहीं है । मानव उन तत्त्वों की सहायता से कोई अन्य वस्तु तो बना सकता है । किन्तु उन मूलतत्त्वों को नहीं बना सकता । वह स्वर्ण से गहने तो बना सकता है । किन्तु जिन मूल तत्त्वों से स्वर्ण बना है , वह उन्हें नहीं बना सकता । संसार के समस्त मूलतत्त्वों एवं मूल पदार्थों पर परमात्मा का यही सिद्धांत लागू होता है ।
इसी लिए मानव को मैं और मेरेपन का अहंकार त्याग कर , उस परम पिता परमात्मा के उपकार को नमन करना चाहिए । और उसके इस दैवीय उपकार से उऋण होने हेतु , सभी समर्थ व्यक्तियों को परमात्मा के प्रति समर्पित भाव से , उसके उन निर्धन , निर्बल एवं सामाजिक न्याय से वचित बंदों को , सामाजिक सम्मान दिलाने हेतु , मानवीय आधार पर सभी सार्थक प्रयास अपना कर्तव्य समझ कर करने चाहिए ।
जिसके दिव्य साधनों से तुमने इतना पाया है । उसके असहाय बंदों को भी कुछ राहत देना आपका परम धर्म है । क्योंकि हम सब उसी एक परम पिता परमात्मा की ही संतान हैं । कुछ प्रतिकूल परिस्थतियों ने ही यह सामाजिक अंतर उत्पन्न कर दिया है । जिसे हम सबको मिलकर ही दूर करना होगा । क्योंकि प्रत्येक का प्रत्येक से जुड़ जाना ही सह-योग है । यही सत्यभाव अर्थात सद्भाव है । जो सबको सत्य से अर्थात परमात्मा से योग कराता है अर्थात जोड़ता है ।
इस सत्य को जानना होगा कि परमपिता परमात्मा ने अपनी संकल्पित संतान ‘मानव’ के पालन पोषण हेतु ही यह सम्पूर्ण ऐश्वर्य एवं यह सम्पदा प्रदान की है ।
उसका लक्ष्य उसका ‘संकल्पित-मानव’ है । उसी के लिए सबकुछ है ।
यदि मानव न होता तो कुछ भी न होता । क्योंकि मानव के अस्तित्व में वह स्वयं समाहित है । अपने अंश से ही उसने मानव को अस्तित्व प्रदान किया है । मानव की सेवा केवल मानव सेवा नहीं ,बल्कि परमात्मा की साधना है । इसी लिए जगत में प्रधानता धन की नहीं बल्कि परमात्मा को अपने हृदय में बसाये हुए , परमात्मा के अंश उसी मानव की ही है । उसने मानव के लिए सम्पदा पैदा की है ,सम्पदा के लिए मानव को पैदा नहीं किया । इस लिए इस सच्चाई , इस यथार्थ को जीवन का आधार मानते हुए , केवल धन के लिए नहीं बल्कि मानव और मानवता के प्रति समर्पित भाव से जीना चाहिए । यही सच्चा मानव धर्म है ।
‘ विश्व मिशन मानवता ’ के माध्यम से मेरा यही प्रयास रहेगा कि मैं विश्व को ईश्वर , धर्म और सामाजिक न्याय के यथार्थ दर्शन से परिचित करा सकूं । जिससे कि सम्पूर्ण विश्व में परस्पर प्रेम और सद्भावनायुक्त
नवप्रभात का उदय हो सके ।
