‘मेरा चिंतन जगत’
जब मैं स्वयं को इस जगत के केन्द्र मे खड़ा पाता हूँ । तो मेरा आत्म चिंतन मेरे चारों ओर , इस अनंत जगत में समाहित होने के असंख्य द्वार खोल देता है । इन्हीं से होकर मुझे जगत के अंतर में प्रवेश करना है । अब यह मुझे तय करना है कि मैं किस द्वार से प्रवेश करूं ।
स्वाभाविक रूप से मेरा चिंतन मेरे परम इष्ट , परम आराध्य ‘ परमसत्य परमपिता परमात्मा की ओर ही जायेगा । जहां मुझे उससे अलग कुछ और सूझता ही नहीं है । क्योंकि केवल वही अशेष है और वही पूर्ण है । उससे अलग कहीं कुछ और है ही नहीं । केवल एक वही सत्य है , वही नित्य है और वही अमृत है ।
जगत का वही सृष्टा और वही सृष्टि है । वही दृश्य और वही अदृश्य है । वही दृश्य और अदृश्य दोनों में रूपांतरित है । जीव और निर्जीव दौनों में भी वही व्याप्त है । निर्जीव में समाहित होकर वह जगत आधार है और जीव में समाहित होकर वह उसकी चैतना शक्ति है । मनुष्य की आत्म अनुभूति में समाहित होकर वह परम आनंद है ।
उसी परम पिता परमात्मा की दिव्य अनुभूति में जगत कल्याण निहित है ।
अध्यात्म को पूर्णतः व्यवहारिक बनाना होगा :
अध्यात्म जगत के मूल तत्त्व एवं उसके अद्भुत स्वरूप का विज्ञान है । इसी के द्वारा मूल तत्त्व अर्थात आत्मा और परमात्मा के ज्ञान तक पहुँचा जा सकता है । यही जगत का मूल तत्त्वज्ञान है । इसे जान लेने के पश्चात , फिर और कुछ , जानने के लिए शेष नहीं बचता ।
आत्मा , परमात्मा और सत्यात्मा :
जो जगत के अंतर में अंशतः [अशेष ] व्याप्त है , अर्थात उसकी व्याप्तता से लेशमात्र भी कुछ अलग नहीं बचता है । उसके अंतर में व्याप्त होने के कारण वह ‘आत्मा’ कहा जाता है । जो अलौकिक एवं अद्भुत है । उसे लौकिक मान्यताओं से नहीं परखा जो सकता । केवल अलौकिक अनुभूति ही उसे अनुभव करने में सक्षम है ।
परमात्मा दिव्य अमृत है :
वह जीव एवं निर्जीव दोनों में पूर्णतः समाहित है । इसी कारण कहा जाता है , कण- कण में भगवान । सम्पूर्ण जगत में पूर्णतः व्याप्त केवल वही तत्त्व है । उस जैसा कोई अन्य तत्त्व नहीं है । इसी लिए वह सर्वोच्च है ,परम है । तभी तो वह ‘परमात्मा’ है ।
उसमें कभी कोई परिवर्तन नही होता । क्योंकि वह निरंतर है , अमर है , अमृत है । तभी तो केवल वही सत्य है । क्योंकि जो नित्य है वही सत्य है और जो सत्य है वही नित्य है । तभी तो वह ‘सत्यात्मा’ है । उसकी दिव्यता के कारण उसे अनेक नामों से पुकारा जाता है ।
वही जगत आधार एवं सत्तावान :
जगत में व्याप्त यह परमात्मा ही सत्य है , और यह सत्य ही जगत में सत्तावान है । क्योंकि अपनी नित्यता के कारण केवल सत्य ही ‘सत्तावान’ हो सकता । यही सृष्टा है ,यही सृष्टि है । यही दृश्य और यही अदृश्य है । कण कण में समाहित होने से यही जगत ‘आधार’ है । जिस दिन यह आधार नहीं रहेगा , उस दिन यह जगत अदृश्य हो जाएगा । अर्थात यह प्रलय होगी । और सृष्टि सृष्टा में विलीन हो जाएगी ।
मनुष्य के भीतर से परमात्मा ही बोलता है :
परमात्मा ने सृष्टा के रूप में जगत की रचना की । उसने अपने संकल्प द्वारा मानव को अपने अंश से उत्पन्न किया । मानव शरीर में जब तक वह परमात्मा विराजमान है , मानव तभी तक ‘ मैं ’ बोल सकता है । उसके निकलते ही सिर्फ मिट्टी बचती है ।
जगत में जो भी कुछ है सब परमात्मा का है :
परमात्मा ने जगत को अपार ऐश्वर्य प्रदान किया । तभी तो उन्हें ‘ईश्वर’ पुकारा जाता है । मनुष्य को केवल अपने कर्म द्वारा इस ऐश्वर्य को अपने उपयोग के योग्य बनाना है । मानव इसे परमात्मा की कृपा समझ कर जीवन भर इसका उपयोग करे ,किन्तु इससे जुड़े नहीं । इसे अपना न समझे । क्योंकि गगत में जो है ,वह सब परमात्मा का है । मानव को जगत से खाली हाथ जाना है । जगत परमात्मा के संरक्षण में ज्यों का त्यों बना रहेगा ।
सत्य ,सद्भाव , मानव और जगत :
सम्पूर्ण मानव जगत परमात्मा की संकल्पित संतान है । सब में उसी का अंश व्याप्त है । इसी लिए अनजाने ही सब उसी के सह – योग से एक दूसरे से जुड़े हुए हैं । यह एकता मानवीय गँठबंधन का प्रमाणित प्रतीक है । जिसमें परमात्मा समाहित है । इसलिए सबको मानव में , मानव से पहले उसमें समाहित परमात्मा को देखना चाहिए । यही सत्य भाव अर्थात सद्भाव है ।
ज्ञान तत्त्व केवल बांटने के लिए है :
जो तत्त्व जगत कल्याण का आधार है । परमात्मा ने ज्ञान जैसा अमूल्य तत्त्व केवल मानव को दिया है । उसको मानव जगत में जंन -जन तक पहुंचाना प्रत्येक ज्ञानी का परम धर्म है । ज्ञान तत्त्व बांटने के लिए ही बना है । परमात्मा की इस अमूल्य निधि का दुरुपयोग अधर्म है ।
ध्यान साधना और उसका आधार :
ध्यान साधना का आधार है निर्मल मन ,सत्य भाव और सत्य कर्म । इन्हें व्यवहार में उतार लेने के उपरांत परमात्मा से योग अत्यंत सहज एवं सरल हों जाता है । आप जैसे ही ध्यान लगाने हेतु बैठेंगे , सहज ही परमात्म योग को प्राप्त हो जाएंगे । ध्यान साधना का उद्देश्य केवल आत्म उत्थान है कुछ और नहीं । उसे उसी रूप में देखना चाहिए ।
यह विषय एक व्यापक विषय है । किन्तु मैंने केवल इसके व्यवहारिक पक्ष पर ही प्रकाश डाला है । जिससे कि सामान्य व्यक्ति भी इससे जुड़ सके । समस्त ज्ञान जन- जन तक सहज एवं सरल स्वरूप में पहुंचना चाहिए । कोई भी साधना नर्मल मन ,सत्य भाव और सत्य कर्म के बिना संभव नहीं है ।
सद्भाव और संसार :
सद्भाव अर्थात सत्य भाव , यह परमात्मा का भाव है जो याद दिलाता है ,कि परमात्मा में संसार और संसार में परमात्मा व्याप्त है । संसार के प्रत्येक अंश में वह विराजमान है । परमात्मा युक्त एक कण मे आप खोजेंगे , तो उसमें आपको ‘पूरा-जहाँ’ मिल जाएगा । ऐसा अद्भुत परमात्मा प्रत्येक मनुष्य में बैठा है । किन्तु यथार्थ से अनिभिज्ञ मनुष्य धन संपदा के पीछे दौड़ रहा है । उसे यह पता नहीं कि यह कभी भी किसी की हो ही नहीं सकती । केवल परम पिता परमात्मा ही अपना है । उसी से जुड़ कर रहिए ।
सत्य से जुड़ कर मनुष्य सत्यात्मा से जुड़ जाता है । जहां से उसे कल्याण मार्ग मिलना अत्यंत सरल है । यदि वह भटक कर सांसारिक मोह में खो जाता है , तो उसे जीवन के अन्तिम समय में अवश्य पछताना पड़ता है । किन्तु तब तक बहुत देर हो चुकी होती है ।
परमार्थ ,सद्भाव और सुख :
परम अर्थ में परमात्मा ही प्रधान है । अपने जीवन में उसे उतार लीजिए ,आप स्वतः परमात्मामय हो जाएंगे । योग ,ध्यान और साधना सब आपके अंतर में समाहित हो जाएंगे । ‘सुख’ संसार का सर्वाधिक प्रचलित शब्द है । सुख की खोज लगभग सभी करते हैं । किन्तु सुख पाने में नहीं ,देने में है । दूसरों के सुख में ही आपका परम सुख निहित है । वास्तव में सुख परमानंद है ,जो सांसारिक मोह से परे परम चिंतन में व्याप्त है । परमार्थ में समाहित है । यही सत्य भाव अर्थात सद्भाव है । जो प्रेम रूप से मानव जगत को एक दूसरे से जोड़ता है ।
