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।। निवेदन ।।

यह निवेदन एक संतभावना का है । जो मानवीय सद्भाव हेतु परमार्थ जैसे उत्तम  उद्देश्य को विश्व के हर हृदय तक पहुँचाने की पावन सेवा में संलग्न है । परमात्मा ने विश्व को अनंत संपदा, अनंत ऐश्वर्य प्रदान  किया है । वह उसका भरपूर उपयोग करे ,इसकी उसे पूरी छूट है । किन्तु  छूट केवल इसके उपयोग की है , इसके स्वामित्व की नहीं । क्योंकि इसका स्वामी तो वह स्वयं है । कोई अन्य इसका स्वामी हो ही नही सकता । क्योंकि केवल वही नित्य है । जगत में उसी की सत्ता है । यहाँ न कोई कुछ लेके आता है और न ही यहाँ से कोई कुछ  लेके जाता है । जगत का ऐश्वर्य और जगत की संपदा अपने स्वामी के स्वामित्व में स्थिर एवं सुरक्षित  है । यही जगत का सत्य है ।

इस जगत का दूसरा सत्य यह भी है कि परमात्मा के संकल्प से उत्पन्न ‘मानव’ ही उसके इस जगत का नायक है । वही अपने कर्म  के आधार पर इसके उन्नत स्वरूप का शिल्पकार है । किन्तु ,यदि उसका कर्म ,   कर्मयोग की परिधि में प्रवेश कर जाता  है , तो  परमात्मा की कृपा से  वह जगत के कल्याणकारी स्वरूप का शिल्प कार भी हो सकता है । क्योंकि उस समय प्रेरणा स्वरूप परमात्मा ही उसके व्यक्तित्व में समाहित हो जाता है ।

विश्व में बड़े बड़े शिल्पकार व बड़े बड़े कर्मयोगी मौजूद है । जिन्होंने अपनी दक्षता,क्षमता और कड़ी मेहनत के आधार पर अपनी आर्थिक स्थिति बहुत दृढ़ की हुई है । जिस कारण विश्व के सामाजिक विकास में तीव्रता आई है । ऐसे कर्मयोगियों का समाज में विशेष सम्मान होना ही चाहिए । उन्हें और भी अधिक सुविधाएं मिलनी चाहिएं । जिससे कि विश्व का अर्थतंत्र और अधिक विकसित व मजबूत हो सके ।

धन जीवन की आवश्यकता है । किन्तु प्रत्येक व्यक्ति को उसकी  मात्रा  और उसके  उपयोग की सीमा पर नियंत्रण रखना चाहिए । कभी कभी असीमित प्रयोग से बहुत गुणकारी वस्तु भी कष्टदायी बन जाती है । कहीं ऐसा न हो कि धन के अनुचित प्रयोग से ,आपका धनी होना ही आप के असम्मान का कारण बन जाए ।

सुखी एवं संतुलित जीवन के लिए आत्म संतोष बहुत महत्व पूर्ण है । जिसके बिना मनुष्य जीवन असुरक्षित है ।  क्योंकि सुख का वही वास्तविक आधार है । जो केवल धन से प्राप्त नहीं होता । उसके लिए आपको अपने आत्म संयम और नैतिक दायित्व पर विशेष ध्यान देना होगा  । ये ही आपके व्यक्तित्व की शालीनता और आपके आत्म सम्मान  की सुरक्षा के आधार हैं ।

सभी सम्पन्न लोगों से निवेदन है कि वे स्वयं को सदैव अपने धन के बजाय अपने शालीन व्यक्तित्व से मापें । और इसी को अपनी पहचान मानते हुए , अपने जीवन में सहजता और सरलता को मान्यता दें , तथा अपनी व्यावसायिक क्षमता को और मजबूत बनाने में जुट जांय । आप ही समाज की अर्थ व्यवस्था के आधार है । आपको पूर्ण सम्मान और समुचित व्यावसायिक सुविधाएं मिलनी ही चाहियें । जिससे कि आप विश्व क आर्थिक ढांचे को और अधिक सुदृढ़ता प्रदान कर सकें ।

आप से नम्र निवेदन है कि आप समाज के उस पिछड़े वर्ग के उत्थान में अपना सहयोग प्रदान करें जो आज भी अपने पिछड़ेपन के कारण गरीबी रेखा को पार नहीं कर पाया है । और सामाजिक असंतुलन की पीड़ा को झेल रहा है । ऐसे पुण्य कार्य के लिए यदि आप अपने खर्चों में थोड़ी सी भी कटौती कर देंगे तो वांछित लक्ष्य को प्राप्त करनाअसंभव नहीं होगा ।  और आपका यह पावन सहयोग मानवता के विश्व  इतिहास में सदैव  अविस्मरणीय रहेगा ।