मेरा काव्य परिचय
मेरे हृदय में कविता के उदय होने से पहले मैं एक आध्यात्मिक भावना में रमा रहने वाला गम्भीर युवक था । फिर अनजाने ही मेरे हृदय में कविता की निर्मल धारा बहने लगी । और मैं इस निर्मलता को अपनी कविताओं में उतारने लगा । पहले गंभीर मानवीय संवेदनाओं पर कविता की , किन्तु फिर मैं अपने आध्यात्मिक भावों को ही कविता में ढालने लगा । मेरी अधिकतर कविताएं तत्त्व ज्ञान पर ही हैं ।
जब मैं मेरठ कालिज का विद्यार्थी था तो वर्ष के सर्वश्रेष्ठ कवि का सम्मान मेरी कविता ‘ मैं विरह कीआत्मा हूँ ’ को प्रदान किया गया । जो नारी की वेदना की अभिव्यक्ति थी ….
आंसुओं में ढल चुकी हूँ ,अब दया का दान मत दो ।
मैं विरह की आत्मा हूँ , मिलन का वरदान मत दो ।।
मान से अपमान दो , अपमान से सम्मान मत दो….
‘ मान से अपमान दो , अपमान से सम्मान मत दो ’ यह पंक्ति बड़ी लोकप्रिय हुई । आज भी पुराने परिचित मुझे फोन करते हैं तो यह पंक्ति याद दिला देते हैं ।
संतों से आशीर्वाद और मार्ग दर्शन पाने हेतु , निवेदन स्वरूप यह कविता उन्ही को समर्पित है । उन्हीं के सम्मान में इसकी रचना हुई …
हे संत सदा जगते रहना , चाहे सारा जग सो जाए ।
हे ज्ञानदीप जलते रहना , जबतक न सवेरा हो जाए ।।
यह जगत एक जादू नगरी की तरह है । यहां कभी भी कुछ भी घट सकता है । यहां बड़ी होशियारी व समझदारी से चलने की आवश्यकता है । इस लिए ज्ञान का सहारा लेते हुए ही इस जादू नागरी से पार पाना चाहिए ….
दुनिया की जादू नगरी में , मन सोच समझ कर चलना तू ।
जीवन की कच्ची गगरी में, जल सोच समझ कर भरना तू ।।
इस रंग बिरंगी दुनिया का, हर रंग अनौखा लगता है ,
तू किस रंग में रंग पाएगा, जग पल पल रंग बदलता है ,,
कोई भरमाए कितना भी, बस सच के संग संग रहना तू….
मन मनुष्य को निरन्तर भटकाता रहता है । वह उसके सही दिशा में जाने की इच्छा का निरन्तर विरोध करता है । किन्तु सच्चे मार्ग पर चलने का उसका दृढ़ निश्चय उसे उसके इष्ट से जोड़ ही देता है ….
माने न मेरी बात मन , मेरे चले ना साथ मन ।
जिसओर भी चाहे मुझे, उसओर ही ले जाए मन ।।
मैं त्याग के मारग चलूं , मन भोग की आशा करे ,
जगछोड़ में प्रभुको भजूं,मन जगकी अभिलाषा करे ,,
जितना बचूँ उलझन से मैं ,उतना मुझे उलझाय मन ….
इस कर्म प्रधान जगत में मनुष्य अपने पुरुषार्थ से जीवन की अनेक ऊँचाइयों को छू सकता है । जिसके मन में अपने लक्ष्य के प्रति सच्ची लगन हो , वह उसे प्राप्त कर ही लेता है ….
तेरे ही कर्मों से तेरा , इतिहास जगत में बनना है ,
चाहे तो तू कंकर बन जा ,चाहे तो तू कुंदन बन जा ।
तेरा हर सपना सच केवल, तेरे ही श्रम से होना है,
चाहे तू पैरों की माटी या माथे का चंदन बन जा ||
मनुष्य जीवन के सत्य से भटक कर जब सांसारिकता के फेर में फंस जाता है तो मानव जीवन पाकर भी निराशा के सिवाय उसके हाथ कुछ नहीं लग पाता । किन्तु मनुष्य को किसी भी हाल में आशा का दामन नहीं छोड़ना चाहिए ….
दुखमें कभी सुखमें कभी, यह जिंदगी योंही गई ।
सोते हुए , जगते हुए , ही उम्र सारी कट गई ।।
खुलते गए सब भेद पर , हम आँख मुंदे ही रहे ,
सच छोड़ करके झूठ के , हम पैर छूते ही रहे ,,
आखें खुलीं तो क्या खुलीं जब पैंठ सारी उठ गई ….
जीवन मार्ग दो दो कदम चलते चलते ही अंतिम पड़ाव तक पहुँच जाता है । इस दुनिया की यही रीत है । किन्तु इस कुछ दिन की जिंदगी में सभी को प्यार बांटते चलिए ….
दो चार कदम दो चार कदम मंजिल यूं ही आ जानी है ।
ना तेरी है ,ना मेरी है , इस जग की यही कहानी है ।।
बस फूलों से ही प्यार न कर ,शूलों कॉ भी अपनाता चल,
दोनों जीवन के साथी हैं , दोनों से प्यार निभाता चल,
हो फूल भरी या शूल भरी , हर राह यहीं रह जानी है ….
यह जगत कुछ लोगों के लिए एक भूलभुलैया है । क्योंकि उनके जीवन में कुछ ऐसा घटता है , जिसके कारण उन्हें लगता है कि जग वैसा नहीं है जैसा उन्हें दीखता है । यह है कुछ और ,और दीखता है कुछ और ….
इस जग की भूलभुलैया में जीवन यूं ही खो जाता है ।
जगने से पहले पहले ही ,जग अंधियारा हो जाता है ।।
तू पागल है जगके पीछे ,जग किसका साथ निभाता है ,
यह छलिया ऐसे छलता है , ईश्वर भी याद न आता है ,,
आता है पल जब जाने का , मन पछताता रह जाता है….
जीवन में तेरे जितने साथी , जितने परिवारजन हैं ,यहाँ तक कि तेरा शरीर तक तेरे साथ नहीं चलेगा । इन सब के पीछे क्यों अपना समय गँवाता है । बस ,तू परमात्मा से जुड़ जा । इस गीत की रचना लोकभाषा में हुई है ….
जब छूटें तेरे प्राण रे , संग को को चलैगौ ।
लिखलै वा वा कौ नाम रे, संग जो जो चलैगौ ।।
तेरे ही तोय , घर के बाहर करेंगे ,
लकड़िन की ढेरी , पै तोहै धरेंगे ,,
जब लागै तोमें , आग रे संग को को जलैगौ….
मनुष्य को संसार में कब तक रहना है ,यह केवल परमात्मा ही जानता है , फिर भी वह संसार से अपना मोह नहीं त्यागता और दिन रात जगत में हमेशा बने रहने के सपने सँजोता रहता है । किन्तु सत्य तो कुछ और ही है …
पंछी ! न तिनके जोड़ तू , रुकना न तेरा काम है ।
आया है ज्यों उड़ जायगा , तू बादलों की छाँव है ।।
खोया है मृग तृष्णा में जो , तृष्णा से ही जल जायगा ,
मिलना किसी को कुछ नहीं,हर हाथ खाली जायगा ,,
यह जग किसी का भी नहीं , यह दूसरों का गाँव है ….
परमात्मा कि दिव्यता उसके चिंतन में डूब जाने से अनुभव होती है । वह जगत के कण कण में समाहित है । तभी तो यह जगत अपनी जगह ठहरा हुआ है । क्यों कि वही जगत का आधार है । जिस दिन उसने स्वयं को समेट लिया ,तो यह जगत अदृश्य हो जाएगा ….
उसने रचा संसार को , कण कण में आकर बस गया ।
उसकी अनौखी दिव्यता से , जगत सारा भर गया ।।
उसको समझना है तुझे , तो सब समझ आ जायगा ।
तू एक – कण में खोज ले ,सारा जहाँ मिल जाएगा ।।
यह जगत परमात्मा के संकल्पित विशाल ‘मानवसमूह’ और उसके सद्भाव का संसार है । यह सद्भाव ही सम्पूर्ण मानव समूह को उसके ‘सत्य’ स्वरूप ,परम पिता परमात्मा के ‘सत्य भाव’ से जोड़ता है । क्योंकि परमात्मा का यह सत्य भाव ही सद्भाव है ….
तू जिंदगी के खेल में, हर एक को साथी बना ।
क्योंकि अकेले खेल में, ना जीत है ना हार है ।।
सद्भावना के भाव से तू सत्य को दिल में बसा ।
हरएक से मिल प्यार से,यह प्यार का संसार है ।।
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